कालमेघ क्या है, इसकी खेती कैसे करें, कितना उत्पादन मिलेगा, कितनी कमाई होगी, आइये इस लेख में जानते हैं कालमेघ की खेती के बारें में।
कालमेघ क्या है
किसान कुछ अलग खेती में करना चाहते हैं, आमदनी बढ़ाना चाहते हैं, तो वह कालमेघ की खेती भी कर सकते हैं। इसके बारे में यहां पर पूरी जानकारी दी जा रही है। कालमेघ एक औषधीय फसल है, जिसका इस्तेमाल कई तरह की दवाई बनाने में किया जाता है, कालमेघ की फसल कई तरह की छोटी और बड़ी बीमारियों को दूर करने के लिए बहुत ही ज्यादा मददगार साबित होता है।
इससे कई तरह के उत्पाद बनाए जाते हैं, घरेलू नुस्खो में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। पेट में गैस हो, खाना ना पचे, कीड़े हो तो इसका इस्तेमाल होता है। मलेरिया हो, सर दर्द हो या रक्त शोधक करना हो, विषनाशक में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। पेट की बीमारियों के लिए फायदा है। यह एक ज्वर नाशक माना जाता है। औषधि गुण से भरा हुआ पौधा है। इसकी जड़ों का इस्तेमाल कई तरह के औषधि के रूप में करते हैं।
इसका रस इस्तेमाल किया जाता है। सर्दियों में भी इसका इस्तेमाल करते हैं. कालमेघ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। इसका जो सेवन करते हैं उन्हें एसिडिटी से राहत मिलती है। यह चर्म रोग के लिए इस्तेमाल होता है, आईए जानते हैं इसकी खेती कैसे होती है।
कालमेघ में एंटीबैक्टीरियल, एंटी इन्फ्लेमेटरी, एंटीऑक्सीडेंट और एंटीवायरल जैसे गुण होते हैं। जिससे खून साफ होता है। शरीर के विषैला पदार्थ को बाहर निकालता है। कालमेघ का इस्तेमाल भारतीय चिकित्सा पद्धति में जैसे कि आयुर्वेद में यूनानी में और होम्योपैथी में भी किया जाता है। कालमेघ का स्वाद कड़वा होता है। जिससे पाचन दुरुस्त होता है, एलोपैथिक दवाएं इससे बनाई जाती हैं, कालमेघ की डिमांड इस समय आयुर्वैदिक फार्मा उद्योग में बहुत है।
कालमेघ की खेती कैसे होती है
कालमेघ की खेती बीजों के द्वारा की जाती है। इसका तना होता है, और तनों पर शाखाएं निकलती है और उसमें पत्तियां आती हैं। यह छोटे कद वाला पौधा होता है। जहां पर छाया होती है वहां पर और ज्यादा होता है। कालमेघ की खेती के लिए हल्की माध्यम दोमट मिट्टी अच्छी होती है। जहां पर जल निकासी की व्यवस्था हो, गर्म आद्र जलवायु में इसकी खेती कर सकते हैं। एक एकड़ में 400 से 500 ग्राम बीजों की जरूरत पड़ती है। नर्सरी बनाकर पौधों की रोपाई कर सकते हैं।
जैविक खाद जैसे कि गोबर की पुरानी खाद डालकर उत्पादन बढ़ा सकते हैं। पानी की ज्यादा जरूरत नहीं होती। अगर बारिश होती है तो सिंचाई नहीं करना पड़ता। सुखा में दो से तीन बार सिंचाई कर लेते हैं। फूल आने की अवस्था में पूरा पौधा काटकर सुखाया जाता है। सूखी पत्तियों और तनों को बाजार में बेचा जाता है।
कालमेघ के बीजों की बुवाई के लिए पहले उसे 12 घंटे या 1 दिन के लिए पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद बुवाई की जाती है। पहले नर्सरी तैयार कर रहे हैं तो बेड बनाकर नर्सरी तैयार कर सकते हैं, नर्सरी तैयार होने के बाद 20-25 दिनों के बाद 10 से 12 सेंटीमीटर जब वह लंबे हो जाते हैं तो उन्हें दूसरे जगह पर लगाया जाता है। जिसमें दो पौधों के बीच की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर, दो पंक्तियों के बीच की दूरी 30 से 40 सेमी रखते हैं।
कालमेघ की खेती का समय
कालमेघ की खेती करना चाहते हैं तो समय की बात करें तो बुवाई जून से जुलाई में की जाती है। अगर सिंचाई की व्यवस्था नहीं है तो जुलाई अगस्त में बुवाई कर सकते हैं।
कालमेघ की फसल कितने दिन में तैयार होती है
कालमेघ की फसल तीन से चार महीने में तैयार हो जाती है। मतलब की 90 से 120 दिन के बीच में और इसकी कटाई सितंबर से अक्टूबर में जब पौधे में फूल आने लगते हैं उस समय की जाती है। कुछ जगहों में अगस्त नवंबर में फूल आते हैं उस समय कटाई होती है और बीज के लिए रुकना चाहते हैं तो फरवरी मार्च तक में पौधे की कटाई की जाती है। पौधों को काटकर सुखाकर उसे बेंचा जाता है।
कालमेघ की खेती में कमाई
कालमेघ की खेती से होने वाली कमाई की बात करें तो यह उस पर निर्भर करता है कि आपको भाव कितना मिल रहा है, गुणवत्ता कैसी है, जिसमें पैदावार अगर 8 से 10 क्विंटल मिल जाती है, जिसमें 800 से 1000 किलो सुखामाल होता है तो उसका भाव 100 ₹100 किलो तक मिल जाता है, तो इस हिसाब से 80000 से ₹100000 तक की कमाई हो जाती है।
वही खर्च इसमें 25 से 35 हजार रुपए तक आ सकता है, अगर किसान के पास खाद उपलब्ध है, पानी की सुविधा है, खेत तैयारी के लिए कृषि यंत्र हैं तो खर्चा कम हो सकता है इसमें ₹70000 तक शुद्ध मुनाफा हो सकता है। अगर भाव ज्यादा मिले तो कमाई बढ़ जाती है।
किसानों के लिए अनुसार कालमेघ की औसतन उपज 1500-2000 किलोग्राम एक हेक्टेयर से मिल जाती है। जिससे अच्छी आमदनी हो जाती है।
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