कद्दू जैसे सामान्य फसल लेकिन वेराइटी अलग लगाकर किसान सिर्फ 45 दिन में अच्छी-खासी कमाई कर सकते हैं वह भी बहुत कम खर्चे में।
कद्दू की विदेशी वैरायटी की खेती में मुनाफा
किसान इस समय पारंपरिक फसलों को छोड़कर नई-नई तरह की सब्जियों की खेती कर रहे हैं और अपने आमदनी में बढ़ोतरी कर रहे हैं। जिसमें भारत में कई किसान कद्दू की विदेशी वैरायटी की खेती कर रहे हैं जिसका नाम जुकिनी है। यह पीली जुकिनी किसानों को बहुत ज्यादा अच्छा खासा मुनाफा दे रही है। जुकिनी बाजार में ग्राहकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
देखने में भी अलग-अलग लगती है कई लोग तो बस चखने के लिए ही खरीद लेते हैं। इसलिए किसानों के लिए बाजार में अच्छा भाव मिल रहा है। सिर्फ मंडी में सामान्य ग्राहक ही नहीं बड़े-बड़े रेस्टोरेंट वाले भी पीली जुकिनी की डिमांड रखते हैं। जिससे इसकी अच्छी कीमत मिल जाती है।
जुकिनी की खेती में लागत और मुनाफा
पीली जुकिनी की खेती में खर्च और मुनाफा की बात करें तो यह कम लागत में किसानों को ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल है। इसमें मेहनत भी कम आती है। अन्य सब्जियों के मुकाबले बस सही तरीके से किसानों को खेती करनी चाहिए। जिसमें लागत किसान ने बताया कि एक बीघा में खाद और बीज के खर्चे को देखें तो 7 से 8000 रुपए ही लगता है लेकिन मुनाफा इससे 70 से 80 हजार रुपए तक हो सकता है।
अगर बढ़िया अच्छा गुणवत्ता वाली फसल किसानों को मिल जाए तो और मंडी में अच्छा भाव मिलेगा। जिसमें कीमत की बात करें तो ₹50 से लेकर ₹70 किलो तक इसका भाव मिल जाता है। कभी-कभी तो 160 रुपए किलो भी यह बिकता है बस गुणवत्ता और बढ़िया मंडी में फसल जाए।
जुकिनी की खेती कैसे की जाती है
जुकिनी की खेती फरवरी से मार्च के बीच और अक्टूबर से नवंबर के बीच में किसान कर सकते हैं। इसके बीज अंकुरण के लिए 20 से 25 डिग्री के सेल्सियस के बीच का तापमान होना चाहिए। यानी कि जिन क्षेत्रों में 20 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने लगा है, तो वह अभी भी इसकी खेती कर सकते हैं।
जुकिनी की खेती के लिए खेत की तैयारी करते समय जैविक खाद मिलाएं 2 से 3 बार गहरी जुताई करने के बाद उसके बाद बेड बनाकर ऊंची क्यारियों में इसकी खेती करें। मल्चिंग पेपर का इस्तेमाल कर ले तो बेहतर होगा, खरपतवार नहीं उगेगी, मिट्टी में नमी बनी रहेगी। बीजों की बुवाई के बाद हल्की सिंचाई करें, बीच-बीच में निराई गुड़ाई हल्की करते रहे, बताया जाता है कि 45 से 50 दिन में फसल तैयार हो जाती है, उसके बाद 50 दिन तक उत्पादन मिलते रहता है।









